Friday, March 22, 2019

रंग, पानी और होली

होली की ढेर सारी शुभकामनाएं
मुझे लगता है कि होली हम सब मे बचपन की बहुत सारी यादें ताजा करती है: आज भी लगता है कॉलोनी की सड़कों पर पानी बिखरा हुआ है और उस रंगों से भरे पानी के साथ दौड़ता हुआ मैं। सभी दोस्तों को सुबह जल्दी खेलने के लिए बुलाना और रंगों से भरे हाथों से सबको रंग देना। बॉलीवुड के गानों को छतों पर बजाना ताकि कोई कभी हमारे जोश को कम ना कर सके। शाम की सूखी होली, जहां सभी रिश्तेदारों पड़ोसियों के साथ इकटठा होना और दही वड़े और काजू-किशमिश के साथ अन्य सूखे मेवों की दावत उड़ाना।
मुझे वह समय याद है जब मैंने पहली बार रंगों के बारे में सीखा था। मैं एक दो साल का था, जब मैंने सिर्फ एक तस्वीरों की किताब के जरिये सफेद, नीले, पीले, लाल, बैंगनी, हरे, नारंगी और काले रंग के स्पेक्ट्रम से परिचय किया था, तब बोलना सीखा था। मेरे प्राथमिक विद्यालय ने इन रंगों को एक नया अर्थ दिया। स्केच पेन और क्रेयॉन ने मुझे दर्शकों की बजाय एक कलाकार की तरह रंग समझने की अनुमति दी। मैंने अपना बचपन पेंटिंग कार्टून कैरेक्टर में बिताया। मिकी माउस और उसके गोल कान, डोनाल्ड डक और उसकी चोंच, मिन्नी माउस और उसकी आंखें, कितनी हसीन थी रंगों की वो जादुई दुनिया। 
कुछ साल बाद, इन रंगों ने अपना अर्थ बदल दिया। मैंने क्रिकेट खेलना और पीछा करना शुरू किया। अब नीले का मतलब भारत था, हरा पाकिस्तान था, लाल का मतलब जिम्बाब्वे, पीला ऑस्ट्रेलिया और काला, न्यूजीलैंड था।
जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, रंग अपना मतलब बदलते रहे। मेरे मध्य विद्यालय में, एक कैथोलिक स्कूल, मैंने पहली बार एक श्वेत व्यक्ति को देखा। सांता क्लॉस की तरह एक सफेद दाढ़ी के साथ, उन्हें फादर एलन के रूप में पेश किया गया था। वह नए हेडमास्टर थे, जो एक परोपकारी व्यक्ति होने के साथ साथ एक गोरी चमड़ी वाले व्यक्ति भी थे। मुझे याद है कि मेरे स्कूल जाने वाले दोस्त हेडमास्टर के साथ उनकी भूरी त्वचा से मेल खाने के लिए पाउडर और फेयरनेस क्रीम लगाते थे। हमारे बीच के गहरे रंग के लोग हेडमास्टर जी को विदेशी कह कर उनका उपहास उड़ाते थे। मैंने चीजों को नोटिस करना शुरू कर दिया। हमारी कक्षा में परियों का उपनाम कभी नहीं था। हम अपनी क्लास में किसी को गोरा तो किसी को काला कह कर आनंद लेते थे। रंगभेद से ग्रस्त समाज में, मीडिया और बॉलीवुड ने रूढ़िवादिता को बढ़ाने में अपना योगदान दिया। अधिकांश अभिनेता और अभिनेत्रियाँ गोर थे। खलनायक और वंचित हमेशा गहरे रंग के होते थे। जल्द ही, पुरुषों की ब्यूटी क्रीम के विज्ञापनों ने शाहरुख खान के साथ टीवी पर काम करना शुरू कर दिया! यह अब केवल अंधेरा सुंदर के रूप में मनाया जा रहा है, लेकिन केवल छोटे समूहों और कुलीन लोगों द्वारा बनाई गई फिल्मों में।
हाई स्कूल में, मैंने पढ़ना शुरू किया। इतिहास की किताबें, आत्मकथाएँ। मैंने नस्लवाद के बारे में सीखा, नस्लवाद के बारे में, अपने रंगों के कारण अफ्रीकी पुरुषों की गुलामी के बारे में। रंग, विशेष रूप से त्वचा, उपनिवेशवाद के पीछे मूल कारण था। यह स्किन टोन था जिसने कॉलोनाइजरों को खुद को दुनिया से वरिष्ठ बताने के बारे में सोचा। उन देशों को देखें जो उपनिवेश थे। उनमें से कितने सफेद थे? काले लोगों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने में सदियों लग गयी लेकिन ये जंग आज भी जारी है।
रंग राजनीतिक हैं। रंग पहचान को परिभाषित करते हैं। झंडों में रंग होते हैं। आंदोलनों में रंग होता है, सबसे शानदार एक इंद्रधनुष है जो एलजीबीटीक्यू समुदाय के खिलाफ उत्पीड़न से मुक्ति के लिए खड़ा है। विचारधाराओं का रंग है। साम्यवाद का लाल कुछ को प्रेरित कर सकता है, दूसरों को भयभीत कर सकता है। एक देश की खेल जर्सी में रंग होता है। होली की तरह ही, रंग लोगों को बांधते हैं लेकिन हममें से कुछ लोग असुरक्षित महसूस करते हैं, इसलिए वास्तविक जीवन में रंग प्रभावित करते हैं। जब मैं बहुत ज्यादा केसरिया या लाल या हरा रंग देखता हूं, तो मुझे भी अजीब सा डर घेर लेता है।
मुझे पानी पसंद है, और मैं ऐसा ही बनना चाहता हूं। यह बेरंग, शांत, ठंडा है। यह प्यार और स्वीकार है। यह अंतर नहीं करता है। यह हर किसी और किसी के रंग को प्राप्त करता है। मुझे पानी वाले रंग पसंद हैं। मुझे वे संभावनाएं पसंद हैं, जिनमें वे शामिल हैं, वे कैनवस जिन्हें वे चित्रित कर सकते हैं, वे आनंद ले सकते हैं। शायद इसलिए होली पानी के साथ खेली जाती है। मैं सिर्फ अपने संबंधित रंगों के साथ दुनिया को रंग देने की दौड़ में उम्मीद करता हूं की हम पानी के स्वभाव से जुड़े।

ऋतेश चौधरी

Wednesday, August 29, 2018

गाली का सामाजिक महत्व

बुरी मानी जाने वाली वस्तु का भी क्या सामाजिक महत्व हो सकता है? मुझे तो लगता है होता है । अब हम खोज रहे हैं गाली के समर्थन में तर्क। ऐसा कोई अक्षर नहीं जिससे किसी मंत्र की शुरुआत न होती हो। अब देखने वाली बात है कि गाली शब्द दो अक्षरों ‘गा’ और ‘ली’ के संयोग से बना है। जो कि खुद ‘ग’ तथा ‘ल’ से बनते हैं। अब जब ‘ग’ व ‘ल’ से कोई मंत्र बनेगा तो ‘गा’ और ‘ली’ से भी जरूर बनेगा। अब आज के धर्मपारायण, धर्मनिरपेक्ष देश में किस माई के लाल की हिम्मत है जो कह सके कि मंत्र का सामाजिक महत्व नहीं होता? लिहाजा निर्विरोध तय पाया गया कि ‘गा’तथा’ली’ से बनने वाले मंत्रों का सामाजिक महत्व होता है। जब अलग-अलग शब्दों से बनने वाले मंत्रों का है तो मिल जाने पर भी कैसे नहीं होगा? होगा न! हां तो यह तय पाया गया कि गालियों का सामाजिक महत्व होता है।

अरब देशों में तमाम लोगों का काम केवल एक पत्नी से नहीं चल पाता या जैसे अमेरिकाजी में केवल एक जीवन साथी से मजा नहीं आता वैसे ही ये दिल मांगे मोर की तर्ज पर हम और सबूत खोजने पर जुट ही गये। इतना पसीना बहा दिया जितना अगर तेज टहलते हुये बहाता तो साथ में कई किलो वजन भी बह जाता साथ में। हिंदी थिसारस समांतर कोश में गालियां खोजीं। जो मिला उससे हम खुश हो गये, मुस्कराने तक लगे । अचानक सामने दर्पण आ गया । हमने मुस्कराना स्थगित कर दिया।

हिंदी थिसारस में बताया गया है कि गाली देना का मतलब हुआ कोसना। अब अगर विचार करें तो पायेंगे कि दुनिया में कौन ऐसा मनुष्य होगा जो कभी न कभी कोसने की आदत का शिकार न हुआ हो? अब चूंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है लिहाजा उसके द्वारा किये जाने वाले कर्मों के सामाजिक महत्व की बात से कौन इन्कार कर सकता है? लिहाजा गाली देना एक सामाजिक महत्व का कार्य है।
इसी दिशा में अपने मन को आर्कमिडीज की तरह दौडा़ते हुये हमने अपनी स्मृति-गूगल पर खोज की कि सबसे पहले कोसने का कार्य किसने किया? पहली गाली किसने दी? पता चला कि हमारे आदि कवि वाल्मीकि ने पहली बार किसी को कोसा था। दुनिया जानती है कि काममोहित मैथुनरत क्रौंच पक्षी के जोडे़ में से नर पक्षी को बहेलिये ने मार गिराया था। इस पर मादा क्रौंच पक्षी का विलाप सुन कर वाल्मीकि जी ने बहेलिये को कोसा:-
मां निषाद प्रतिष्ठाम् त्वम् गम: शाश्वती शमा,यत् क्रौंच मिथुनादेकम् वधी: काममोहितम् ।
(अरे बहेलिये तुमने काममोहित मैथुनरत कौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी प्रतिष्ठा न मिले)
इससे सिद्ध हो गया कि पहली बार जिसने कोसा था वह हमारे आदिकवि थे। एक के साथ एक फ़्री के अंदाज में यह भी तय हुआ कि जो पहली कविता के रूप में विख्यात है वह वस्तुत: कोसना ही था। अब चूंकि कोसना मतलब गाली देना तय हो चुका है लिहाजा यह मानने के अलावा कोई चारा नहीं बचता कि पहली कविता और कुछ नहीं वाल्मीकिजी द्वारा हत्यारे बहेलिये को दी गयी गाली थी ।

Tuesday, March 4, 2014

नौकर की कमीज, विनोद कुमार शुक्ल


अर्थशास्त्र के शिक्षक ने कुछ दिनों के बाद उनको समझाया, "तुम्हारी पत्नी मर गयी. इससे तुम्हें बहुत नुकसान हुआ. स्कूल में मास्टरनी थी, दो सौ रुपये महीना कमाती थी. घर का खाना, दूसरे काम, बच्चों की देख-रेख, कपड़े धोना, झाडू लगाना बहुत से काम करती थी. कोई काम कराने वाली औरत होती तो इतने काम का कम-से-कम सौ रूपये लेती और रद्दी काम करती. इमानदारी से तुम्हारी गृहस्थी की देख-रेख नहीं करती. गन्दी होतीउज्जड होती, चोर होती. तुम्हारी पत्नी तुम्हारे साथ बिस्तर पर सोती थी. अब तुम्हारे बिस्तर पर कोई नहीं सोयेगा. इसके लिए बाज़ार में तुम कितने भी सस्ते-से काम चलाओ, आधे घंटे के कम-से-कम दो रुपये लग जायेंगे.वह बिस्तर कैसा होगा, इसका अंदाज़ लगा लों. बदनामी का डर रहेगा. नौकरी जाने का भी डर रहेगा.- अब तुम हिसाब करके बतलाओ, एक महीने में तुम्हें कुल कितने रुपये का नुकसान हुआ?"
इसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने दूसरी शादी कर ली."

Thursday, April 25, 2013

वो चले गये....

दादाजी इस दुनिया मे नही हैं। रहते तो पता नही खुश होते या नही, जब उन्हे पता चलता कि मै लेखक हो गया हूं। लेखक, बचपन से सुनता आ रहा हूं और अक्सर मै कुछ भी अपने मन की बकवास लेकर दादाजी के पास जाता और उन्हें सुनाता तो वे मेरी माँ से कहते, "देखना एक दिन ये अपनी जुबान का खाएगा"। पता नही वे ऐसा क्यों कहते थे मगर आज लगता है कि उनकी बात खरी हो रही है। वे अपने कहे को आशीर्वाद मे बदलते देखने के लिये आज मौजूद नही है,मगर मुझे लग रहा है कहीं न कहीं से वे मुझे ऐसा बनते देख रहे होंगे और मन ही मन मुस्कुरा रहे होंगे।

कविता और कहानियाँ मेरे लिये नया कुछ भी नही है। थोड़ा बहुत समझने लायक हुए तो खुद को इलाहाबाद के ऐसे माहोल में पाया जहाँ चारो तरफ़ लेखको की आत्मा घूमती थी और मैंने हर वक्त ख़ुद को इन लेखको से घिरा हुआ पाया। हमारे पुरखे वैसे तो मेरठ के एक गाव रजापुर मे रहा करते थे। लेकिन मूलतः उत्तर प्रदेश में जिला गाजियाबाद के छोटे से कस्बे मुरादनगर में दादाजी की नौकरी के कारण पापाजी के वक्त से ही आकर यहाँ बस गए थे । पापाजी को लगता था के ये छोटा सा क़स्बा पढ़ाई लिखाइ के लिया पर्याप्त नही है । क्यूंकि यहाँ सारे के सारे लोगों का एक ही धंधा, कविताई का। मेरे घर के आसपास तीन-चार ऐसे लोग भी रहते थे जिनका पढ़ाई लिखी से कोई वास्ता नही था फ़िर भी कवियों की संगत में रहकर वो ख़ुद को महा कवि से कम नही आंकते थे। घर से चंद कदमो की दूरी पर था एक चौक जिसका नाम था परिवर्तन चौक। बाहर से आने वालों के लिये रेफ़रेंस से लेकर पोस्टल एड्रेस तक़। टैक्सियां या आटो रिक्शे और तांगे सबको पता बताया जाता था परिवर्तन चौक के पास जाना है भाई।

समय तो जैसे उड़ता चला गया। हम भी और लोगो की तरह थोड़ा बड़े होने लगे थे और नये दोस्त बनाने की गरज से घर के आसपास खिंची लक्ष्मण रेखा पार कर मुहल्ले की ओर जाने लगे थे। पतंग से लेकर क्रिकेट तक़ सभी के लिये टीम वहीं बन पाती थी। बाबूजी को जब पता चला तो उन्होने फ़रमान जारी कर दिया कि उधर नज़र आये तो बिना मुरव्वत के धुनाई होगी। स्कूल तक़ पाबंदी जारी रही। कालेज मे प्रवेश लेने की बात आई तो मैने मां से कहा कि मै मोदी कालेज मे पढना चाहता हूं। मोदी कालेज उस समय छात्र राजनीति और दादागिरी दोनो के लिये मशहूर था। माँ ने सीधे सीधे इस मामले से हाथ खींच लिये और कहा कि तू जान तेरे पापा जाने। लाख चिरौरी के बावजूद जब मां नही मानी तो पापाजी से डरते-डरते खुद ही कहने की हिम्मत जुटाई और जैसे ही कहा तो जवाब ये मिला नेतागिरी करनी है या सायरी वायरी को भूत सवार है। पहले बता दो आख़िर तुम्हे बनना क्या है ? वहां पढना था तो काहे कान्वेंट की फ़ीस भरते रहे। सरकारी स्कूल वालो को भी वहां एडमिशन मिल जाता है। मेरे स्कूल के सारे साथियो ने वहां प्रवेश ले लिया था। पापाजी अंत तक़ राजी नही हुए और मुझे बगल के कालेज को छोड़ सात सो किलोमीटर दूर स्थित इलाहाबाद में पढ़ाई के लिए जाना पड़ा। सिर्फ़ सायर, लेखक ना बनूं इस लिये पापाजी इच्छा के अनुरूप बी ऐ तक़ वहां पढाई की। हालांकि ग्रेजुयेशन के तत्काल बाद एक भैया के तेवर देख कर मैंने पत्रकार बनने की पूरी तैयारी कर ली थीं, मगर पता नही क्यूँ तब मुझे पत्रकार बनना स्तर का नही लगता था।

पता नही क्यों जो जो नही बनना चाहा वही बनता गया। पत्रकार नही बनना चाहता था कुछ कुछ बना और वैसे ही लेखक भी। पत्रकारिता में स्नातकोत्तर करने के बाद लगा कि पत्रकारिता ही अपने लिये ठीक रहेगी। लेकिन जब तक पत्रकार बनते तब तक़ लखनऊ विश्वविद्यालय मे अतिथि प्रवक्ता के पद पर निर्वाचित हो चुके थे। यहाँ से राजनीति के गुर मजबूरन सीखने पड़े, मुझे ऐसा मालूम हुआ की यहाँ तो बिना राजनीती किए जीया ही नही जा सकता, वो रोमांच मुझे राजनिती की ओर खींचने लगा और मां ने जब इसकी शिकायत पापाजी से कि तो उन्होने कहा बड़ा हो गया है। अपना भला बुरा समझता है। जाने दो जो जी मे आये करे कुछ नही कर सकेगा तो कबाड़ी बन जायेगा।

मास्टरी से ज़ल्द ही मोहभंग हो गया। मां अक्सर कहती थी कुछ कर रे। तभी अचानक़ एक अख़बार मे रिपोर्टर की नौकरी हाथ लग गई।

ऐसा लगा कि सब सैटल हो जायेगा मगर हुआ नही। अड़ियल स्वभाव आड़े आता रहा। नौकरी लगने के साथ ही छोड़ने का सिलसिला जो तब शुरू हुआ वो आज भी जारी है। कहीं कुछ समय के लिये काम करना शुरू होता नही है कि लोग पूछने लगते है कब छोड़ रहा है। कभी दोपहर को थक कर घर जाकर सो जाओ तो मां पूछ लेती है छोड़ दिया क्या रे। ये इमेज हो गई है अपनी। खैर पापाजी से मिलने वाली आर्थिक मदद के दम पर मै भी पाकिस्तान कि तरह निरंकुश होता चला गया। पत्रकारिता मे कुछ साल मौज करने के बाद पापाजी की नौकरी छूट गई और एक दिन अचानक दादाजी हम सब को बिलखता छोड़ कर चले गये। मै चाह कर भी उस दिन रो नही पाया। उस दिन मैंने बहुत कुछ लिखा, मेरा लिखा हर शब्द  मेरी आँख से फ़ुट कर आया था, यही वजह थी की मै रोया नही।

आज अपनी पहचान में कुछ कहने के लिए है, लेकिन जिसको सुनना था, वो चले गये....

Wednesday, November 21, 2012

अच्छा लगता है

अच्छा लगता है
किसी छुट्टी वाले दिन
अतीत की अल्मारी से
किसी मनपसंद किताब को निकालना
और खुशबू वाली चाय की
चुस्कियों में डूब कर
एक-एक शब्द में डूबते जाना।
अच्छा लगता है
पालतू तोते के साथ बतियाना,
आंगन में फुदकती चिड़िया के साथ हो लेना
या फिर मिनी के लिए
आटे की चिरैया बना कर देना।
अच्छा लगता है
बरसों पुरानी चिट्ठियों को पढ़कर
कभी हँसना तो कभी रोना...
और खुशबू वाली ठंडी हो चुकी
चाय को एक ही साँस में पी लेना।
अच्छा लगता है
छुट्टी वाले दिन
आया की छुट्टी कर देना
और तुम्हारे लिए नाश्ता बनाना।
इन्हीं यादों के साथ
अच्छा लगता है बाकी के छ: दिन
विश्वविध्यालय तक का सफर करना
ऑफिस की पॉलिटिक्स को सहना
और सुबह से निकलकर देर रत को लौटना॥ 

Sunday, August 14, 2011

आरक्षण

12 अगस्त यों तो प्रकाश झा की बहुचर्चित फिल्म आरक्षण के प्रदर्शन का दिन है लेकिन इसी फिल्म के साथ-साथ लगभग पाँच-सात छोटी और मझौले किस्म की फिल्में भी इसी दिन प्रदर्शित होने जा रही हैं।प्रकाश झा की पिछली कुछ फिल्मों से जिस तरह प्रदर्शन पूर्व प्रायोजित किस्म के प्रतिवाद-विवाद और सुर्खियाँ दिखायी देने लगी हैं, वैसी ही आरक्षण के साथ भी पिछले एकाध माह से अखबारों में छोटी-बड़ी खबरों के रूप में नजर आ रही हैं। अपहरण के साधु यादव वाले विवाद से लेकर राजनीति में कैटरीना की छबि या आरक्षण में विषय का ही मूल मुद्दा बनना कितना यथार्थपरक है, कितना फिल्म के पक्ष में माहौल के लिए, इसकी चर्चा प्रबुद्ध करते हैं।
कभी खबर यह बनती है कि लखनऊ में बच्चन साहब को छात्रों के बीच सम्बोधित करने की अनुमति नहीं मिली, कभी उत्तरप्रदेश में ही इस फिल्म के लिए फिल्म के दूसरे सितारों के साथ की जाने वाली यात्रा को प्रोत्साहित नहीं किया गया बल्कि व्यवधान पेश किए गये। चार दिन पहले अखबार में छपा कि कि बच्चन साहब और प्रकाश झा पर पटना में मुकदमा दर्ज हुआ। आरक्षण फिल्म विरोधी हवा उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र से बिहार तक पहुँच गयी है।
वैसे यह दिलचस्प है कि प्रकाश झा भोपाल में फिल्म पूरी बना लेने के बाद भोपाल या मध्यप्रदेश छोड़ शेष भारत में कलाकारों के साथ जाने के लिए आतुर और उत्सुक हैं, उन जगहों में जहाँ तार से तार रगडक़र स्पार्क से फुलझड़ी का मजा लिया जा सके। फिल्म जहाँ बनी, वो जगह, राजनीति फिल्म के समय की तरह ही उपेक्षित है।
जब राजनीति फिल्म का प्रदर्शन हुआ था तब यह अपेक्षा की जा रही थी कि निर्देशक और सितारे भोपाल में उन तमाम कलाकारों के साथ इस खुशी को सबसे पहले बाँटेंगे जो एक झलक से लेकर एक सीन के छोटे-बड़े हिस्से थे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भोपाल से जो हाइप इस फिल्म को प्रदर्शित होने पर मिला, उसका प्रभाव व्यापक रहा और फिल्म को उस तरह की व्यावसायिक सफलता मिल गयी, जिसने प्रकाश झा के अपहरण और गंगाजल वाले आत्मविश्वास और और समृद्ध कर दिया। झा, भोपाल उन दिनों तब आये जब फिल्म प्रदर्शित हुए चार-पाँच हफ्ते हो चुके थे। आरक्षण में हालाँकि राजनीति की तरह हजारों कलाकार मध्यप्रदेश के नहीं हैं मगर फिर भी जो हैं वे एक-एक दिन गिन ही रहे हैं। जाने इस बात भी उनकी इच्छा पूरी हो पाती है या नहीं।
आजकल सिनेमाघरों में जिस तरह फिल्मों को चढ़ाने और उतारने का चलन आम हो गया है, उसमें कम समय में अधिकतम लागत वसूल करके अगली फिल्म लाने-लगाने की तैयारी की जाने लगती है, ऐसे में पता नहीं भोपाल में आरक्षण का प्रीमियर हो सकेगा कि नहीं, कलाकारों के साथ विशेष शो हो सकेगा कि नहीं या हफ्ते-दस दिन निर्देशक या कोई सितारा, भोपाल के कलाकारों के साथ खुशी बाँट सकेगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता।

Saturday, October 16, 2010

आरम्भ है प्रचंड

आरम्भ है प्रचंड
बोले मस्तकों के झुण्ड
आज जंग की घडी की तुम गुहार दो
आन बाण शान या की जान का हो दान
आज इक धनुष के बाण पे उतार दो

आरम्भ है प्रचंड
बोले मस्तकों के झुण्ड
आज जंग की घडी की तुम गुहार दो
आन बाण शान या की जान का हो दान
आज इक धनुष के बाण पे उतार दो
आरम्भ है प्रचंड

मन करे सो प्राण दे
जो मन करे सो प्राण ले
वही तो एक सर्वशक्तिमान है
मन करे सो प्राण दे
जो मन करे सो प्राण ले
वही तो एक सर्वशक्तिमान है

कृष्ण की पुकार है
ये भगवत का सार है
की युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है
कौरवों की भीड़ हो या
पांडवों का नीद हो
जो लड़ सका है वोही तो महान है

जीत की हवस नहीं
किसी पे कोई वश नहीं
कया ज़िन्दगी है ठोकरों पे मार दो
मौत अंत है नहीं
तो मौत से भी क्यूँ डरे
ये जाके आसमान में दहाड़ दो

आरम्भ है प्रचंड
बोले मस्तकों के झुण्ड
आज जंग की घडी की तुम गुहार दो
आन बाण शान या की जान का हो दान
आज इक धनुष के बाण पे उतार दो
आरम्भ है प्रचंड

हो दया का भाव
या की शौर्य का चुनाव
या की हार का वो घाव
तुम ये सोच लों
हो दया का भाव
या की शौर्य का चुनाव
या की हार का वो घाव
तुम ये सोच लों

या की पूरे भाल पर
जला रहे विजय का
लाल लाल ये गुलाल
तुम ये सोच लों

रंग केसरी हो या
मृदंग केसरी हो या
की केसरी हो ताल
तुम ये सोच लों

जिस कवी की कल्पना में
ज़िन्दगी हो प्रेम गीत
उस कवी को आज तुम नकार दो
भीगती नसों में आज
फूलती रगों में आज
आग की लापत का तुम बघार दो

आरम्भ है प्रचंड
बोले मस्तकों के झुण्ड
आज जंग की घडी की तुम गुहार दो
आन बाण शान या की जान का हो दान
आज इक धनुष के बाण पे उतार दो
आरम्भ है प्रचंड
आरम्भ है प्रचंड
आरम्भ है प्रचंड

Saturday, August 14, 2010

भारतीय सिनेमा


भारतीय सिनेमा में कुछ ऐसी फिल्में हैं, जिनके लिए कहा जाता है कि उन्होंने हिंदी सिनेमा का इतिहास बदल दिया, पर वास्तविकता कुछ और है. दरसल इसके लिए निर्देशक-लेखक को बधाई नहीं दी जानी चाहिए. शक्ति सामंत की फिल्म आराधना के गीतों ने न जाने कितने युवाओं के मन में अपने सपनों की रानी की कल्पना को शक्ल दे दी थी. उस दौर के युवकों ने न जाने कितनी हसीनाओं को रूप तेरा मस्ताना गीत सुनाकर दिल दिया होगा. इस फिल्म ने उस दौर के आशिकों के दिल में इश्क़ की आग लगा दी थी, लेकिन यह फिल्म शक्ति दाका ओरिजनल कांसेप्ट न होकर हॉलीवुड की टू इच हीज ऑन की नक़ल मात्र थी. इसी तरह ऋृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म अभिमान ने जया बच्चन को फिल्मफेयर बेस्ट एक्ट्रेस का पुरस्कार दिलवाया था. यह फिल्म ए स्टार इज बॉर्नकी नक़ल थी. 90 के दशक में महेश भट्ट की सुपरहिट फिल्म साथी से पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहसिन खान एवं आदित्य पंचोली स्टार बन गए थे. जबकि साथी को मिलने वाली सफलता और अवार्ड के सही हक़दार स्कारफेस के लेखक थे, क्योंकि यह सुपरहिट फिल्म भी एक नक़ल थी.
नरेंद्र बेदी की खोटे सिक्के एवं फिरोज़ खान की धर्मात्मा से लेकर रामू की सरकार जैसी फिल्मों को हिंदी सिनेमा में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए याद किया जाता है, लेकिन यह सारे बदलाव दूसरे मुल्क़ों की कहानियों को चुराकर किए गए. 1980 में ऋषि कपूर स्टारर फिल्म क़र्ज़ ने सुभाष घई को शीर्ष निर्देशकों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया, लेकिन तब शायद ही कोई जानता होगा कि यह फिल्म 1960 में आई हॉलीवुड फिल्म द रिइंकारनेशन ऑफ पीटर प्राउड की नक़ल थी. रवि चोपड़ा द्वारा निर्देशित फिल्म द बर्निंग ट्रेन वर्ष 1975 में आई जापानी फिल्म द शिंकनसेन दैबाकुहा की नक़ल थी. अ
शोक कुमार की हास्य पटकथा वाली बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म शौक़ीन हॉलीवुड की फिल्म द ब्वॉयज नाइट आउट की नक़ल थी. राकेश रोशन द्वारा निर्देशित फिल्म खून भरी मांग, जिसे तीन फिल्म फेयर अवार्ड मिले, वह भी ऑस्ट्रेलियन लघु फिल्म रिटर्न टू एडेन से प्रेरित थी. मुकुल आनंद द्वारा निर्देशित फिल्म अग्निपथ को दो फिल्मफेयर अवार्ड मिले और बेस्ट एक्टिंग के लिए अमिताभ बच्चन को नेशनल फिल्म अवार्ड मिला, जिसके हक़दार वे लोग कतई नहीं थे. निर्देशक संजय ग़ढवी के मुताबिक़ अमेरिका में अच्छे लेखक हैं, जबकि यहां अच्छे लेखकों की कमी है, इसलिए प्रेरणा लेने में कोई बुराई नहीं है. ग़ौरतलब है कि उनकी फिल्म मेरे यार की शादी है, जूलिया रॉबटर्‌‌स की सुपरहिट फिल्म माई बेस्ट फ्रेंड्‌स वेडिंग की नक़ल थी. बॉलीवुड में कलाकारों के कॉस्ट्यूम और नाच-गाने पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है, जबकि हॉलीवुड में फिल्म की स्क्रिप्ट और प्रोडक्शन हाउस ज़्यादा मायने रखते हैं. बॉलीवुड में वेस्टर्न फिल्मों की नक़ल का स़िर्फ नए लोग ही नहीं करते बल्कि इस मामले में इंटेलिजेंट इडियट आमिर खान भी पीछे नहीं है. उनकी सुपरहिट फिल्म गजनी बॉलीवुड की पहली ऐसी फिल्म थी, जिसने बॉक्स ऑफिस पर एक बिलियन रुपये से अधिक का कारोबार किया. यह फिल्म साउथ की सूर्या स्टारर गजनी की रीमेक थी और साउथ वाली गजनी हॉलीवुड फिल्म मोमेंटो की नक़ल थी. मतलब वही चोरी का क़िस्सा. ग़ौरतलब है कि मोमेंटो को वर्ष 2002 में बेस्ट स्क्रीनप्ले के लिए नामांकित किया गया था. बॉलीवुड की नक़ल करने की इस आदत पर वर्ष 2006 में फोर स्टेप प्लान नामक एक डॉक्यूमेंट्री भी बनी.
वर्ष 1940 में आई महबूब खान की फिल्म औरत को सत्रह साल बाद मदर इंडिया के नाम से दोबारा बनाया गया, वह भी वर्ष 1937 में आई हॉलीवुड फिल्म द गुड अर्थ से प्रेरित थी. बॉलीवुड की ऑल टाइम सुपरहिट फिल्म शोलेका निर्माण सात हॉलीवुड फिल्मों की प्रेरणा से हुआ था. उनमें वंस अपॉन ए टाइम इन द वेस्ट (1968), स्पैगिटी वेस्टर्न, द वाइल्ड बंच (1969), पैट गैरेट एंड बिली द किड (1973) और बच कैसिडी एंड द संडेंस किड (1969) आदि प्रमुख हैं. अमिताभ बच्चन की पा 1996 में आई हॉलीवुड फिल्म जैक की नक़ल है. अक्षय कुमार की आने वाली फिल्म एक्शन रिप्ले ब्रैड पिट की सुपरहिट फिल्म द क्यूरियस केस ऑफ बेंजामिन बटन से प्रेरित बताई जा रही है. हासिल फेम निर्देशक तिग्मांशु धूलिया कहते हैं कि उनकी ओरिजनल कहानी पर आधारित फिल्म को कोई भी प्रोड्यूसर फाइनेंस नहीं करना चाहता. तिग्मांशु को अपनी फिल्म के निर्माण के लिए अपने दोस्तों पर निर्भर रहना पड़ा था. इस इंडस्ट्री में स़िर्फ निर्देशकों और कहानीकारों को ही हॉलीवुड की नक़ल करने का भूत नहीं सवार है, बल्कि निर्माता भी किसी फिल्म में पैसा लगाने से पहले यह निश्चित कर लेते हैं कि अमुक फिल्म हॉलीवुड की किसी फिल्म की नक़ल है या नहीं. ऐसी सैकड़ों फिल्में हैं, जिन्हें हॉलीवुड की फिल्मों से नक़ल करके तैयार किया गया है. इन फिल्मों के हिट हो जाने के बाद निर्देशक, निर्माता और कलाकार पुरस्कार लेने के लिए कतार में खड़े नज़र आते हैं. इनमें से कइयों को अवार्ड मिल भी जाते हैं. पुरस्कार क्या, पद्मश्री तक मिल जाती है. अवार्ड देने से पहले और बाद में ज्यूरी मेंबर यह सोचने की ज़हमत तक नहीं उठाते कि क्या सचमुच यह लोग इन पुरस्कारों के हक़दार हैं भी या नहीं.

उधर का माल इधर

अभिमान 1973- ए स्टार इज बॉर्न 1954
धर्मात्मा 1975- द गॉड फादर 1972
रफूचक्कर 1975- सम लाइक इट हॉट 1959
क़र्ज़ 1980- द रिइंकारनेशन ऑफ पीटर प्राउड 1960
द बर्निंग ट्रेन 1980- द शिंकनसेन दैबाकुहा 1975
शौक़ीन 1981- द ब्वॉयज नाइट आउट 1962
जांबाज़ 1981- डुअल इन द सन 1946
सत्ते पे सत्ता 1982- सेवन ब्राइड्‌स फॉर सेवन ब्रदर्स 1954
खून भरी मांग 1988- रिटर्न टू एडेन 1983
तेज़ाब 1988- स्ट्रीट्‌स ऑफ फायर 1984
साथी 1990- स्कारफेस 1983
दिल है कि मानता नहीं 1991- इट हैपंड वन नाइट 1934
जो जीता वही सिकंदर 1992- बे्रकिंग अवे 1979
चमत्कार 1992- ब्लैक बियडर्‌‌स गोस्ट 1968
बाज़ीगर 1993- ए किस बिफोर डाइंग 1991
खलनायिका 1993- द हैंड दैट रॉक्स द क्रौडल 1992
मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी 1994- द हार्ड वे 1991
अकेले हम अकेले तुम 1995- क्रैमर वर्सेस क्रैमर 1979
याराना 1995 - स्लीपिंग विथ एनेमी 1991
पापी गुड़िया 1996- चाइल्ड्‌र्स प्ले 1988
चोर मचाए शोर 1997- ब्लू स्ट्रीक
गुलाम 1998- ऑन द वाटर फ्रंट 1954
दुश्मन 1998- आई फॉर एन आई 1996
मोहब्बतें 2000- डेड पोएट्‌स सोसाइटी 1989
क़सूर 2001- जैग्ड ऐज 1985
कांटे 2002- रिजर्वायर डॉग्स 1992
राज़ 2002- वाट लायज बिनिथ 2000
धूम 2003- द फास्ट एंड द फ्यूरियस 2001 एवं ओसियंस एलेवन 2001
जिस्म 2003- बॉडी हीट 1981
कोई मिल गया 2003- ई. टी. द एक्सट्रा टेरेसट्रियल 1982
हम तुम 2004- वेन हैरी मेट सैली 1989
मुन्ना भाई एमबीबीएस 2003- पैच एडम्स 1998
मर्डर 2004- अनफेथफुल 2002
सलाम नमस्ते 2005- नाइन मंथ्स 1995
ब्लैक 2005- द मिराकल वर्कर 1962
बंटी और बबली 2005- बोनी एंड क्लायड 1967
सरकार 2005- द गॉड फादर 1972
रंग दे बसंती 2006- ऑल माई संस 1948 एवं जीसस ऑफ मांट्रील 1989
कृष 2006- पे चेक 2003
चक दे इंडिया 2007- मिराकल 2004
भेजा फ्राई 2007- डिनर डे कॉन्स 1998
लाइफ इन ए मेट्रो 2007- द अपार्टमेंट 1960
हे बेबी 2007- थ्री मेन एंड अ बेबी 1987
वेलकम 2007- मिक्की ब्लू आइज 1999
सिंह इज किंग 2008- मिराकल्स 1989
दोस्ताना 2008- नाउ प्रोनाउंस यू चक एंड लैरी 2007
युवराज 2008- रेन मैन 1988

Thursday, July 29, 2010

जब उसकी धुन में रहा करते थे।
हम भी चुप चाप जिया करते थे।

आँखों में प्यास हुआ करती थी।
दिल में तूफ़ान उठा करते थे।


किसी वीराने में उससे मिलकर।
दिल में कई फूल खिला करते थे।

लोग आते थे ग़ज़ल सुनने को।
हम उसकी बातें किया करते थे।
घर की दीवार सजाने की खातिर।
हम उसका नाम लिखा करते थे।

कल जब उसको देखा तो याद आया।
हम भी कभी इश्क किया करते थे।

Saturday, June 12, 2010

मुस्कान के पीछे का दर्द

ऐसी तो बिलकुल नही थी वो, उसकी मुस्कान के पीछे जो दर्द था उसे हर किसी के लिए समझ पाना नामुमकिन था। कहते है की शादी दो परिवारों, दो आत्माओ का मिलन है, पर न जाने क्यूँ दिलों के बंधन तो आज भी खुले है। मेरी दोस्त क्या थी और क्या हो गयी। लंबा अरसा हो गया शादी को एक छोटा बच्चा भी है । आज कितनी उदास है ये तो नही कह सकता लेकिन कल कितनी हसमुख थी , इसका अंदाजा हलकी बारिस के बाद सतरंगी मोसम में महकते फूलों पर चहकते पक्षियों को देख कर लगाया जा सकता है। क्या शादी का मायने यही है की व्यक्ति की निजी आजादी का खो जाना, खो जाना उसकी मुस्कान का, उसके सपनो का। कहते है की शादी कोई जाल नही, वो तो एक डोर है जिसमे आदमी जन्म भर के लीये बंध जाता है। लेकिन उसके लिए  शादी एक जाल हो गयी जिसमे वो फस गयी। उसके मन में पति के तानो का जवाब देने की काशीश  रहती है। पुरुषवादी समाज में उसका जी चाहता है की वो कह सके....


जानते हो, एक दबी हुई इच्छा है कि
मै ऑफिस से आऊँ, और तुम घर पर रहना
आकर तुम्हे कहूँ
जान, आज काम ज्यादा था
इतना थक गयी की कि पुछो मत
तुम्हारा ही काम अच्छा है
घर मे रहते हो, सारा दिन सोये रहते हो....

जानते हो, जी चाहता है कि
मै भी मचल के कहूँ
जान, तुम ऐसे क्यों रहते हो
हमारा भारतीय परिधान धोती कुर्ता
कितना अच्छा लगता है
क्यो तुम हर दिन अंग्रेज बन इठलाते हो

जानते हो, कुंडली मारकर एक इच्छा दबी बैठी है कि
एक दिन शान से कहूँ
जानते हो दाल चावल का भाव
इतने महंगे सामान
मेरी जेब से आते हैं
तुम्हारे घरवाले थोड़ी ना लाते है।

पति पत्नी मिलकर जीवन को जीयें ऐसा कहती है वो लेकिन उन दोनों में कोन है जो अपने धरम को सही ढंग से नही निभा पा रहा। वो मेरी दोस्त है इसलिए उसकी तरफदारी करूँगा तो आप मुझ पर तरफदारी का इल्जाम लगेंगे। लेकिन जब वो मेरी दोस्त है तो उसके तरफदारी करना मेरा धरम है, लेकिन आज सिर्फ उसको पक्ष लेने से दोस्ती का धरम पूरा नही हो जाता। उसके जीवन की गाडी पटरी पर आने का नाम नही ले रही। उसका जीवन साथी अपने धरम को निभा सकने में कितना सफल है नही पता, क्यूंकि एक दिन उसने कहा....

याचना नही है, बता रही हूँ कि अब जीना चाहती हूँ...
बहूत हो गया
अब तलक तुम्हारे बताये रास्ते पर जीती गयी,
जीती गयी या यूँ कहूँ की जीवन को ढो़ती गयी।
पर अब ऐसा नही होगा
हाँ
तुम्हे कोई दोष नही दे रही हूँ
ना ही अपनी स्थिती को
जायज या नाजायज
बताने के लिये लड़ रही हूँ।
मै बस इतना कह रही हूँ
कि
आगे से अब सब बदलेगा
मै अपने शर्तो पर अपने आपको रखूँगी
और जीवन को ढो़ने के बजाय जीऊँगी।
हाँ मेरे जीवन मे
अगर तुम चाहो तो
तुम भी शामिल रहोगे।
यह न्योता नही है
बतला रही हूँ,
तुम चाहो तो मेरे हमकदम बनकर साथ चल सकते हो।
एक आसमान जिसमे हम दोनो का
अपना अपना अस्तित्व हो
वो जमीं
जिसमे हम दोनो की अपनी अपनी जड़े हों
वो मौसम
जिसमे हम दोनो की खुशबु हो
ऐसे वातावरण मे जहा
हम दोनो साँस ले सकें।
पर अगर तुम्हे ये मन्जूर ना हो
तो भी
मै बता रही हूँ।


अकेले जीवन जीना बोझ लगता है, लेकिन आज वो ऐसा कह कर खुद को अकेले में हल्का महसूस करती  है। हमेसा ही पति पत्नी के बीच 'मै' का अहम् टकराता रहा तो एक दिन.....

कभी कभी किसी मोड़ पर रूककर
टटोलती हूँ, अपने आपको
सोचती हूँ
क्या तुम सही थे?

कई बार सोचती हूँ
और जब तुम याद दिलाते हो
कि आज भी तुम हो
तब बेचैनी बढ जाती है

पर सोचो ना
"तुम हो" तुमने यह जताया
पर "मै भी हूँ"
क्या तुम यह जान सके?

"मेरे होने" को तुम अनदेखा करते रह गये
तुम्हारा होना इतना हावी हो गया कि
मुझे खुद को बचाने के लिये
तुम्हारी गली छोड़नी पड़ी

"तुम हो" मै जानती हूँ
पर "मै" भी "हूँ"
तुम नही जान पाये
"मै" वही जी पाऊँगी
जहाँ "मेरा होना" भी होगा

यही सोचकर
फिर से चल पड़ी हूँ
पर तुम्हे बताकर जाना चाहती हूँ
कि जब तुम्हे लगे कि
"तुम्हारे" साथ "मेरा" भी होना
तुम्हे परेशान नही करता
आ जाना
फिर इस अनंत गगन मे
"हम" रहेंगे
मै और तुम से अलग
"हम" बनकर ।

दोस्त मै उम्मीद करूँगा की तुम ऑफिस से आकर कह सको की बहुत थक गयी हो, मै दुआ करूँगा की तू जी सको हम बनकर....

Monday, February 15, 2010

वैलेन्टाइन दिवस

सोचता हूँ कि कुछ साल पहले १४ फ़रवरी के दिन कितने खतरे मोल लेकर हम दोनों मिले थे। तब कुछ ही महीने का साथ था। जानते थे कि मिलने में खतरा है, कि संस्कृति के रक्षक कभी भी पकड़ सकते हैं और फिर जलूस भी निकाल सकते हैं किन्तु लगता था कि उनसे डरना गलत होगा और हम मिले थे। मिलकर खाना भी खाया, संस्कृति के रक्षकों से बचने को थोड़े अधिक मंहगे रेस्टॉरेन्ट में गए थे।कोई यह भी कह सकता है कि यह करना क्या इतना ही आवश्यक था? हमें लगता था कि आवश्यक था।यदि हममें उस दिन साथ खड़े होने का साहस न होता तो शायद हममें परिवार के कुछ लोगों के विरोध के सामने खड़े होने का भी साहस न होता। यदि एक बार साहस दिखा दो तो बार बार साहस दिखाने का साहस आ जाता है। यदि शुरु में ही डर जाओ तो सदा ही डरने की आदत बन जाती है। इतने लंबे अरसे बाद १४ फ़रवरी के ही दिन आज उसने माँ को फोन किया था, खाना बनाना आता है बता रही थी । फिर मैंने बात की। पूछ रही थीं कि वैलेन्टाइन दिवस कैसा मन रहा है तो मैं बताया जिन्दगी के लिए भाग दौड़ कर रहा हूँ । वो हँस रही थीं और कह रही थीं आह, आज का वैलेन्टाइन दिवस ऐसा दौड़ भाग वाला ! पीछे से वह कहे जा रही थी कि नहीं, हमने मनाया, हमने मनाया और हम मना रहे हैं और मनाएँगे।
सच तो यह है कि आज का वैलेन्टाइन दिवस उन सभी पिछले वैलेन्टाइन दिवसों की पराकाष्ठा है, चरम है। उस सबसे पहले वाले का, प्रेम के पहले वर्षों में मनाए गयों का, जब पता था कि चाहे जो हो जाए विवाह करेंगे ही, लेकिन विवाह करने की स्वीकृति नही मिली, नही नही परिवार ने तो दी थी लेकिन खुदा को मंजूर न था । क्यूँ साथ नही है ये चर्चा करना अब फिजूल है । हम साथ आज भी है परन्तु अलग अलग अपना भविष्य बनाते, काम करते, संघर्ष करते। अब जीवन में स्थायित्व आ रहा है। दोनों का अलग अलग अपना घर है, आज जल्दी से एक रेस्टॉरेन्ट में जाकर हड़बड़ी में खाना खाया. लिफ्ट न चलने पर नयी बनती उसी मंजिल पर जहाँ देखने वाला कोई न होता था, जहाँ हम अक्शर जाया करते थे, उसी बन चुके घर की मंजिल पर हाथ पकड़ सीढ़ी चढ़कर गए, लेकिन अलग अलग, बस खवाबों में, यह सब क्या वैलेन्टाइन दिवस नहीं है? भले ही अलग अलग हो लेकिन प्रेम तो साथ आज भी है और अभी अकेले में जो खाना बनाया और कुछ अधजली मोमबत्तियों को ढूँढकर, मेज पर एक इकलौता गुलाब लगाकर अकेले ही उसके अहसास में खाना खाया यह भी वैलेन्टाइन दिवस है। मैं यह नहीं कहूँगा कि यह ही वैलेन्टाइन दिवस है, क्योंकि तब वे पहले वाले सब दिवस छोटे पड़ जाएँगे और वे सब खतरे जो हमने उठाए थे वे भी छोटे बन जाएँगे। परन्तु यह भी वैलेन्टाइन दिवस है। जैसे आज पिछले सब दिवस याद आ रहे हैं वैसे ही यह भी कभी भविष्य में याद आएगा और शायद यह भी एक मील का पत्थर कहलाए।

Saturday, February 6, 2010

खुद को कहीं पीछे छोड़ आया हूँ

जिन्दगी जीते-जीते लगा कि खुद को कहीं पीछे छोड़ आया हूँ । ये बात शिद्दत से महसूस कर रहा हूँ , कि जो निभती जा रही है ; वो ना तो अपनी है, और ना ही किसी मायने मे जिन्दगी। पलट कर नजरें दौड़ाई , साहिल बिल्कुल कोरा था। समय की लहर शायद सारे निशान अपने संग समेटे चली गई ।।जिन्दगी अपनी रफ्तार से चलती गई ; पता नहीं , कब मेरा ’आत्म ’ कहीं ठिठककर खड़ा हो गया । कुछ बेचारगी थी और थोड़ा आत्म-संभ्रन - कि तनिक देर घुम-फिरकर फिर वहीं अपने पास आ जाउँगा । आत्म-संभ्राति के मोह का पर्दा जब खिसका , तो पाया कि मेरा वर्तमान बेबस हो गया है - दूर जाती जिन्दगी को भी नहीं छोड़ सकता और पीछे छूटे विकलांग , अपाहिज वजूद को भी संग लिए चलना चाहता है। सिसकता हुआ आज ,भूत की तस्वीरों के रंग निचुड़ता देख रहा है ; मजबूर है । आने वाले कल के पर कोइ इबरत नहीं उभरेगी - जानता भी है । पर अपनी रंगहीन स्याही वाली कलम चलाए जा रहा है, रोए जा रहा है , गुनगुनाए जा रहा है............

Thursday, August 13, 2009

जब इश्क की बात चली

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जब इश्क की बात चलती है तो मुझे 'वाली असी' का एक शेर याद आता है-
अगर तू इश्क में बरवाद नहीं हो सकता,
जा तुझे कोई सबक याद नहीं हो सकता।
सैकडों उदाहरण मिल जायेंगे जहां प्रेमी ने प्रेमिका की खुशी के लिये बलिदान दिये। बर्बाद हुये। कहानी  'उसने कहा था' के लहनासिंह की प्रेमकथा 'तेरी कुडमाई हो गयी?' के जवाब- 'धत्त' में पूरी जाती है। पर इसका निर्वाह लहनासिंह अपनी कुर्बानी देते हुये प्रेमिका के पति की जान बचाकर करता है. जयशंकर प्रसाद की कहानी 'गुंडा' के बाबू नन्हकू सिंह की बोटी-बोटी कटकर गिरती रहती है पर गंडासा तब तक चलता रहता है जब तक राजा-रानी सकुशल नहीं हो जाते। कारण वो कभी रानी को चाहते थे (जब वो कुंवारी थीं) । शादी नहीं हो पायी पर प्रेमपरीक्षा में पास हुये-अव्वल। 
प्रेम परीक्षा में पतियों का मामला काफी ढीला रहा। चाहे वो राम रहे हों या पांडव। जब उनकी पत्नी को सबसे ज्यादा उनकी जरूरत थी तब ये महान लोग धर्मपालन, नीतिगत आचरण में लगे थे।
बिछडते वक्त बहुत मुतमइन थे हम दोनों, किसी ने मुड के किसी की तरफ नहीं दखा।

Sunday, July 26, 2009

समलैंगिकता -कितनी सही , कितनी ग़लत ?

न्यायलय ने समलैंगिकता को सही ठहरा दिया। कानूनन ये न्यायोचित हो गया की यदि दो एक लिंग के व्यक्ति साथ रहकर सुख और संतुष्टि प्राप्त कर रहे हैं तो इसमे कुछ ग़लत नही है। लेकिन इधर न्यायलय का फ़ैसला आया उधर देशभर में कोहराम मच गया। क्या धार्मिक संगठन , क्या राजनितिक पार्टियाँ, और क्या समाज के ठेकेदार। सभी एक सुर में इस निर्णय की खिलाफत करने मैदान में उतर आए। किसी ने इसे समाज के लिए अभिशाप बताया तो कोई संस्कृति के लिए खतरा बता रहा है। इनमे वो लोग भी शामिल हैं जिनके स्वयं के कृत्यों से संस्कृति अनेकों बार शर्मसार हुई है। जब ये धार्मिक संगठन मन्दिर -मस्जिद को मुद्दा बनाकर लड़ते हैं तो संस्कृति प्रभावित नही होती । जब जींस और बुर्के पर बेबुनियादी फतवे जारी होते हैं तो संस्कृति को नुक्सान नही होता । जिस समाज में नारी को देवी का स्थान दियागया है उसी समाज में जब नारी अपमानित होती है तो संस्कृति सुर्स्क्षित रहती है । लेकिन अगर दो लोग अपनी मर्ज़ी से साथ रहना चाहे तो संस्कृति पर आंच आने लगी। यहाँ पर तो बात समलैंगिको की है ,जब एक लड़का और लड़की अपनी मर्ज़ी से साथ नही रह सकते तो समलैंगिकता को इतनी आसानी से कैसे पचा सकता है ये समाज ।ये सच है की भारतीय समाज में जहा अभी तक अंतरजातीय -विवाह को पूर्ण रूप से मान्यता नही मिली है। समलैंगिकता स्वीकार करना इतना आसान नही है, लेकिन ये कहना की ये संस्कृति को दूषित करेगा, सभ्यता के लिए खतरा बन जाएगा, ठीक नही है ।

Wednesday, June 17, 2009

ये कहीं और सुनने को न मिलेंगे।


कल अचानक बादलों को घिरते देखा। हालाँकि बारीश अभी दूर है लेकिन मैं जब भी पानी से भरे बादलों को देखता हूँ तो उस पिता की याद आती है जो अभी-अभी अपनी लाड़ली बेटी को विदा करके अपने सूने हो चुके घर के एक वीरान से कोने में अकेला खड़ा है। यह पिता एक बार फिर अपनी बेटी के लिए एक हाथी या एक घोड़ा बनना चाहता है जिस पर बैठकर उसकी बेटी सवारी कर सके। उस बादल को जरा गौर से देखिए, जो अब आपके छज्जे को छूकर निकलने वाला है। वह अपनी बेटी की याद में ही हाथी और घोड़ा बनने की कोशिश कर रहा है। ध्यान से सुनिए, यह गड़गड़ाहट की आवाज नहीं है, उस बादल की आत्मा में अपनी बेटी के साथ बिताए बचपन के दिन उमड़-घुमड़ रहे हैं। और यह बादल जो थोड़ा सी हेकड़ी में, दौड़ लगा रहा है, छोटा भाई है। इसकी चाल पर न जाइएगा। यह बादल हलका लग सकता है लेकिन अंदर से यह भी भरा हुआ है। इसकी बहन ने छह साल तक इसकी चोटी की है। अभी तो यह दौड़ रहा है लेकिन रात में जब थक जाएगा, तब घर के पिछवाड़े या किसी पेड़ की ओट में जाकर बिना आवाज किए सुबकेगा। और एक दुबला-पतला बादल जो कुछ कुछ उदास-सा यूँ ही इधर-उधर टहल रहा है, विदा हो चुकी बहन की छोटी बहन है। यह हमेशा दो चोटियाँ करती थी और बड़ी बहन हमेशा उसे डाँटती हुई कहती थी-एक करा कर। मुझे गूँथने में आलस आती है। इस बादल को देखेंगे तो लगेगा इसके चलने में न सुनाई देने वाली हिचकियाँ हैं। इन्हीं हिचकियों के कारण इसमें भरे पानी का अंदाजा लगा सकते हैं। और सबसे आखिर में जो साँवला बादल है वह माँ का आँचल है। उसका आँचल कभी न कहे जा सकने वाले दुःख से भारी हो गया है। अभी भी वह अपनी बेटी की यादों में खोया है जिसमें सुख-दुःख की बातें हैं, उलाहना है, प्रेम में काँपता, सिर पर रखा हुआ हाथ है। यह बादल जब भी बरसेगा, इसे बरसता देख बाकी बादल भी बरसेंगे। अपने को कोई भी नहीं रोक पाएगा। सब बरसेंगे। और ये बरसेंगे तो चारों तरफ जीवन के गीत गूँजेंगे। थोड़ा-सा वक्त निकालकर इन्हें सुनना। ये कहीं और सुनने को न मिलेंगे।

दिल की बात


जब भी लिखना
जी भर के लिखना
जुबान की नहीं,

बस
दिल की बात लिखना।


हमने देखा है,
दिल की बात,
जब दिमाग से होकर,
जुबान पर आती है,

तो
बात बिल्कुल बदल जाती है


यह अलग बात है,
जमाने को वही बात पसंद आती है

माँ गुजर जाने के बाद



ब्याहता बिटिया के हक में फर्क पड़ता है बहुत 
छूटती मैके की सरहद माँ गुजर जाने के बाद 

अब नहीं आता संदेसा मान मनुहारों भरा
खत्म रिश्तों की लगावट माँ गुजर जाने के बाद

जो कभी था मेरा आँगन, घर मेरा, कमरा मेरा 
अब वहाँ अनदेखे बंधन, माँ गुजर जाने के बाद

अब तो यूँ ही तारीखों पर निभ रहे त्योहार सब
खत्म वो रस्मे रवायत, माँ गुजर जाने के बाद

आए ना माँ की रसोई की वो भीनी सी महक 
उठ गया मैके का दाना, माँ गुजर जाने के बाद

वो दीवाली की सजावट, फाग के वो गीत सारे 
हो गई बिसरी सी बातें, माँ गुजर जाने के बाद

Monday, June 15, 2009

मुझे अपनी बाहों मे भर लो


नदी के
के इस पार
शब्दों का मेला है
कोई तुम्हे -
पुकार रहा -माँ
दीदी
पत्नी
दोस्त
प्रेमिका
इस भीड़ के लिए तुम
देह के दर्पण
का
अलग -अलग
हिस्सा हो
किसी के लिए बिंदिया
किसी के लिए राखी हो
आँचल मे प्रसाद सा भरा प्यार
सभी को चाहिए
लेकीन किसी के लिए वैशाखी हो
फिर भी -अपनी सम्पूर्णता के
महा एकांत मे
उस निर्जन मे
नदी के उस पार
मै कह रहा हूँ
आओ मेरे पास
मै हूँ सम्बंधो से परे
एक
शब्द -केवल प्यार
तुम्हारी चेतना
तुम्हारा जागरण
तुम्हारा स्वप्न
तुम्हारी जड़ ,
पूर्ण साकार चंदन सा महकता
वन मै ही हूँ
आओ
मुझे अपनी बाहों मे भर लो

मुझे अपने पास रख लो


अपनी हथेली की रेखाओं मे
मेरा नाम लिख लो
मुझे अपने पास रख लो
अपनी आँखों के पिंजरे मे
मुझे कैद कर लो
अपने मन रूपी गमले मे
मुझे गुलाब सा उगा लो
अपने आँचल के छोर मे
एक स्वर्ण सिक्के सा बाँध लो
मुझे अपने पास रख लो
उड़ते हुवे अश्व पर बैठा
एक राजकुमार
अपने हर स्वप्न मे
मुझे मान लो
अपनी बांह मे बंधी ताबीज
के भीतर
एक मन्त्र सा मुझे भर लो
अपनी गोल बिंदिया सा
मुझे अपने माथे पर
लगा लो
अपने हाथो मे रत्न जडित चुडियो सा
मुझे पहन लो
मुझे
अपने पास रख लो
मै तुम्हारी
पूजा की थाली मे
रोज -दीपक सा जल जाउंगा
मै तुम्हारी जिंदगी मे
शाश्वत -आस्था बनकर रह जाउंगा
मै तुम्हारी साँसों मे
मोंगरे सा महक जाउंगा
मै तुम्हारे ओंठो पर
गुनगुनाता हुवा सा -एक गीत रह जाउंगा
मै प्यार के कोमल कपास से बना तकिया हूँ
तुम्हारी तन्हाई की बांहों के लिए
भींचने के कम मे आ जाउंगा
मुझे अपने पास रख लों