मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के खड़ी बोली कहे जाने वाले मेंरठ जिले में हुआ। लेकिन पढ़ाई मई की भूमि बना इलाहाबाद। प्रयाग में लगी महादेवी वर्मा जी की प्रतिमा हमेशा ही मुझे उत्सुक करती की मैं भी कुछ लिखा करूँ। बेहद खड़ी बोली में अक़्सर मेरे पुराने साथी पूछते है की "र भले मानस तू क्यूककर लिखता है ?" यह 'क्यूककर' मेरी समझ में नहीं आया। 'क्यूककर' का अर्थ शब्दकोश में तो यह मिलता है - कैसे और किस तरह? अब आपको क्या बताऊँ कि मैं क्यूककर लिखता हूँ। यह बड़ी उलझन की बात है। मै अपनी उस कुर्सी पर बैठ जाता हूँ जिसका एक पैर पिछले कई सालो से पापा के लाख कहने के बावजूद नही बन पाया है क्यूंकि अब मुझे उस पर बीतने में मजा आने लगा है , कागज़-कलम पकड़ता हूँ और बस लिखना शुरू कर देता हूँ। मेरी गाय न जाने उस वक्त क्यूँ शोर मचा रही होती है । मैं उनसे बातें भी करता हूँ। उसी वक्त मेरी बहन और भाई के बीच वाक् युद्ध शुरु हो जाता है मै उनकी आपसी लड़ाइयों का फैसला भी करता हूँ, उसी वक्त जब माँ पुंरानी थपकी से चारपाई पर महीनो से बिछी चादर को धोने के लिए कूटती है। ठक ठक की उसकी आवाज में सामिल है एक और संगीत और वो है पापा का स्कूटर स्टार्ट करना । पापाजी जब अपने पुराने स्कूटर को लाख कोसिसो के बाद भी स्टार्ट नही कर पते है और घंटो उसमे जुटे रहते है की ये सोचकर की शायद ये दिन बहुरेंगे और ये सुरीली आवाज के साथ स्टार्ट हो जाएगा। ये सुब इसलिए कहा क्यूंकि लिखने के लिए कम से कम इतना सन्नाटा तो होना चाहिए ही। अपने लिए “रूह्ह्फ़्जा” भी तैयार करता हूँ। अगर कोई मिलने वाला आ जाए तो उसकी खातिरदारी भी करता हूँ, मगर लिखे जाता हूँ। अब 'कैसे' सवाल आए तो मैं कहूँगा कि मैं झक मारने के लिए लिखता हूँ । मुझे झक मरने या यूँ कहो की लिखने की बुरी तरह लत पड़ी हुई है। मैं न लिखूं तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या कुछ छूट गया है जिन्दगी में। मैं नहीं लिखता, हकीकत यह है कि कलम मुझे लिखती है। मैं बहुत कम पढ़ा लिखा आदमी हूँ। यूँ तो मै शोध कार्य में लगा हूँ , कभी कभी कुछ अच्छा भी कह लेता हूँ, कई दर्द ऐसे है जिन्हें मेरी कलम ने कागज पे गहरे दर्द के साथ उकेरा है लेकिन मुझे कभी कभी हैरत होती है कि यह कौन है जिसने इस कदर अच्छे तरीके से खुद को डुबो दिया की असल दर्द से ज्यादा दर्द उन लेखो में आ गया , कौन है वो जिसने ये लिखे हैं, जिन पर आए दिन कोई न कोई हसता रहता है । जब कलम मेरे हाथ में न हो तो मैं सिर्फ़ वो सकस होता हूँ जिसे न हिन्दी आती है न अंग्रेजी और न कोई और भाषा, ये सब तो मेरी कलम जानती है । कोई भी बात जिसपर मुझे लिखना होता है वो बात मेरे दिमाग में नहीं, जेब में होती है जिसकी मुझे कोई ख़बर नहीं होती। मैं अपने दिमाग पर ज़ोर देता हूँ कि कोई बात निकल आए। कहानीकार, उपन्यासकार बनने की भी बहुत कोशिश करता हूँ, कलम घिसता हूँ और कागज फूंकता रहता हूँ मगर मजाल जो कोई बात दीमाग से निकल जाए। जब कोई बात नही निकलती तो आख़िर थक-हार कर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ। बड़ी कोफ़्त होती है। करवटें बदलता हूँ। उठकर अपनी चिड़ियों को दाने डालता हूँ। बच्चों का झूला झुलाता हूँ। घर का कूड़ा-करकट साफ़ करता हूँ। जूते, नन्हे मुन्हें जूते, जो घर में जहाँ-जहाँ बिखरे होते हैं, उठाकर एक जगह रखता हूँ। छोटे छोटे chuho ने जो baasi roti के tukde bikhere है उनको उठा कर अपने छोटे से घर में बने उनके बड़े से घर के पास रखता हूँ मगर कम्बख़्त बात जो मेरी जेब में पड़ी होती है मेरे ज़हन में नहीं utarti और मैं तिलमिलाता रहता हूँ। जब बहुत ज़्यादा कोफ़्त होती है तो बाथरूम में चला जाता हूँ, मगर वहाँ से भी कुछ हासिल नहीं होता। सुना है कि हर बड़ा आदमी बाथरूम में सोचता है। मगर मुझे तजुर्बे से यह मालूम हुआ है कि मैं बड़ा आदमी नहीं, इसलिए कि मैं गुसलखाने में नहीं सोच सकता। लेकिन हैरत का किस्सा यह है कि मैं अपनी उसी प्रेमिका की कसम खाकर कहता हूँ जो सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे ख्याल में मौजूद है कि मुझे इस बारे में कोई इल्म नहीं कि मैं कैसे लिखता हूँ। अक्सर ऐसा हुआ है कि जब मैं लाचार हो गया हूँ तो मेरी वही ख्याल वाली प्रेमिका मेरे पास आई और उसने मुझसे यह कहा है, “आप सोचिए नहीं, कलम उठाइए और लिखना शुरू कर दीजिए।” मैं इसके कहने पर कलम या पैंसिल उठाता हूँ और लिखना शुरू कर देता हूँ- दिमाग बिल्कुल ख़ाली होता है लेकिन जेब भरी होती है, खुद-ब-खुद कोई बात उछलकर बाहर आ जाती है। मैं खुद को इस दृष्टि से जेबकतरा समझता हूँ जो अपनी जेब खुद ही काटता है और आपके हवाले कर देता हूँ-
Friday, March 27, 2009
Wednesday, March 18, 2009
एक स्वपन आँख में आया था
एक स्वपन आँख में था ।
कोख में उसे छुपाया था ।
कुछ दिन भी न छिप पाया , झट गोद में आकर मुस्काया।
हसी खेल में गोद से भी खिश्का मेरा आँचल था ।
मै जरा ठिठका फ़िर आँचल तक सिर से फिसला ।
जब घर से बाहर वो निकला था , चाहा कि वो उड़ना सीखे ।
जब उड़ा तो क्यों नैना भीगे।
उसके जाने पर घर मेरा क्यूँ लगता भुतहा सा।
डेराघर में बिखरी उसकी चीज़ें :
पैंट पुरानी,
कसी कमीजे,
टूटे खिलौने,
बदरंग ताशबने धरोहर,
मेरे पास मुस्काती उसकी तस्वीरें जब तब मुझे रूलाती है ।
उसकी यादें आँसू बन कर मेरे आँचल में छुप जाती है।
फोन की घन्टी बन किलकारी मनं में हूक उठाती है।
पल दो पल उससे बातें कर ममता राहत पाती है।
केक चाकलेट देख कर पर पानी आँखों में आता है।
जाने क्योंकर मन भाता पकवान न अब पक पाता है।
भरा भगौना दूध का दिन भर ज्यों का त्यों रह जाता है ।
दिनचर्या का खालीपन हर पल मुझे सताता है।
कब आएगा मुन्ना मेरा ?
कब चहकेगा आँगन ?
कब नज़रो की चमक बढ़ेगी ?
कब दूर होगा धुँधलापन ????
Thursday, February 26, 2009
इस शहर की भीड़ में पहचान बनने निकला हूँ.........
कहीं टूटा है एक तारा आसमान से उसे चाँद बनने निकला हूँ।
तो क्या हुआ जो जिन्दगी हर कदम पर मारती है ठोकर।
हर बार फ़िर संभल कर मै उसे एक अरमान बनने निकला हूँ।
डूबता हुआ सूरज कहता है मुझसे, कल फ़िर आऊंगा।
मै उस कल के लिए आसमान बनने निकला हूँ।
इस शहर की भीड़ में पहचान बनने निकला हूँ।
कहीं टूटा है एक तारा आसमान से उसे चाँद बनने निकला हूँ।
Sunday, February 15, 2009
तुम मुझ को अच्छे लगते हो ।
एक बात कहूँ गर तुम सुनते हो। तुम मुझ को अच्छे लगते हो ।
कुछ चंचल से.......
कुछ चुप -चुप से.......
कुछ पागल- पागल लगते हो।
एक बात कहूँ गर तुम सुनते हो। तुम मुझ को अच्छे लगते हो ।
हैं चाहने वाले और बुहत......
फीर तुम में है एक बात अलग......
तुम अपने-अपने लगते हो ।
एक बात कहूँ गर तुम सुनते हो। तुम मुझ को अच्छे लगते हो ।
ये बात-बात पर खोजाना.....
कुछ कहते-कहते रुक जाना......
क्या बात है हम से कह डालो , ये किस उलझन में रहते हो।
एक बात कहूँ गर तुम सुनते हो। तुम मुझ को अच्छे लगते हो।
मै अकेला था कहाँ अपने सफर में.....
मै अकेला था कहाँ अपने सफर में.....
साथ मेरे छाव बन चलती रही तुम.....
तुम के जैसे चांदनी हो चंद्रमा मे,
आब मोती मे प्रणय आराधना मे,
चाहता है कोंन मंजील तक पहुंचना,
जब मीले आनंद पथ की साधना मे,
जन्म जन्मो मै जला एकांत घर मे,
और मेरे खवाब मे पलती रही तुम,
साथ मेरे छाव बन चलती रही तुम....
मै चला था पर्वतो के पार जाने,
चेतना के बीज धरती पर उगाने,
छु गए लेकिन मुझे हर बार गहरे,
मील के पत्थर वीदा देते अजाने,
मै दीया बनकर तामस मे लड़ रहा था,
ताप मे बन हीम-गलती रही तुम,
साथ मेरे छाव बन चलती रही तुम....
रह नही पाए कभी थके हारे,
प्यास मेरी ले गए हर सीन्धू खारे,
राह जीवन की कठीन कांटो भरी,
काट दी दो चार सूधीयों के सहारे,
सो गया मै हो थकन की नींद के वस्,
और मेरे स्वप्न मे पलती रही तुम,
साथ मेरे छाव बन चलती रही तुम....
नए ज़माने के प्रेम पुजारी............
प्रेम के पुराने उदाहरणों को याद करे - लैला-मजनू, हीर-राँझा, सोनी-महेवाल, रोमीयो-जुलीअट इन सबकी कहानी एक जैसी है। जैसा हमेसा होता है लोग इनके प्रेम की खिलाफ भी थे। लेकीन वे डटे रहे। जब उन्हें लगा की अपने प्रेम के लिए अपनों को रुसवा करना पड़ सकता है तो एक साथ मर गए। अब समय बदल गया है, तो प्रेम की इमेज में भी बदलाव आना लाजमी है। नए ज़माने के प्रेमदूत खेलते खाते परीवारों की संतुस्ट हस्तीयाँ है। किसी देश का रास्त्रपति है तो कोई सुपर मॉडल, कोई प्रोफेस्सर तो कोई शोध छात्र, कोई सीने-तरीका तो कोई अभिनाते पुत्र। इनके प्रेम को भी जमाने से विरोध मिलता है, लेकीन नए जमाने के ये प्रेमदूत विरोध को भी भुनाना जानते है।
सुपर प्रेम :
सुपर मॉडल कार्ला ब्रूनी और फ्रांस के रास्त्रपति निकोलस सरकोजी का प्रेम तो आज भी हमारे जहन में है। निकोलस का यह पहला प्रेम नही था, इससे पहले वे दो शादी कर चुके थे। उन शादी से उनको संतान भी है। निकोलस की उम्र 52 है और कार्ला की उम्र 40 थी जब उनको प्रेम हुआ और कार्ला बन गई First Lady of france।
पहली शादी न होती तो :
प्रोफेस्सर मटुकनाथ का मुह काला रंगा गया। उनकी प्रेमिका जे.एन.यू की शोध छात्रा जुली को उनकी पत्नी ने चप्पलों से पीटा। प्रोफेस्सर की उम्र और सम्मानित छवि के होते हुए अपनी से आधी उम्र की लड़की से प्रेम खूब चर्चा में रहा। मटुकनाथ को उनकी पत्नी ने सजा के लिए तलाक़ नही दिया। अपने इसी प्रेम के कारण वे प्रेम सभाओ में ज्यादा बुलाए जाते है। वे एक प्रकासन के मुख्य संपादक के रूप में पाट्नर जुली के साथ मीडिया से मुखातीब हुए।
प्रेम की फीजाएं :
एक राजनेता अपने प्रेम के लिए धर्म बदल लेता है। बॉलीवुड की किसी प्रेम कहानी की तरह है हरयाणा के उप मुख्यमंत्री चंद्र मोहन और उनकी दोस्त Assistant advocate general अनुराधा बाली की कहानी। शादीशुदा चंद्र मोहन एक दिन अचानक गायब हो गए और लोटे तो चाँद मुहोम्मद के नाम से अपनी दूसरी पत्नी फीजा उर्फ़ अनुराधा बाली के साथ। ख़बर बनती है । वे टी.वी. पर आते है और कैमरे के सामने एक दूसरे के प्रेम की कसमे खाते है। दोनों के प्रेम पर फिल्म बनने की घोषणा की जाती है. अब उनकी प्रेम कहानी में ट्विस्ट आ गया है। आजकल फीजा का चाँद लुका छुपी खेल रहा है।
नई रीत :
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Wednesday, October 15, 2008
उसकी गली में.......
मजबूर कर के मुझको मेरे यार ले चलो।
दीवाना कह के लोगों ने हर बात टाल दी।
दुनीया ने मेरे पैरो में ज़ंजीर डाल दी।
चाहो जो तुम तो मेरा मुक़द्दर संवार दो।
यारो ये मेरे पैरो की बेडी उतार दो।
उसने किया है मिलने का इकरार, ले चलो.................
उसकी गली में फिर मुझे एक बार ले चलो.................
तुम हरदम खुश रहा करो ...
तुम महेकती बहारों की तरह ,
झील मीलाती पत्तीयों की तरह ,
जी भर के जिया करो , खुश रहा करो............
दिन में उमंगें लीये ,
दिन में उमंगें लीये ,
रात में सुहाने सपने लीये ,
जी भर के जिया करो, खुश रहा करो.............
अगली सुबह को हसी के साथ मिला करो
तुम्हारे लिए और क्या आरजू होगी
'मेरे हमसफ़र' जी भर के जिया करो, तुम हरदम खुश रहा करो ...
जी भर के जिया करो, खुश रहा करो.............
अगली सुबह को हसी के साथ मिला करो
तुम्हारे लिए और क्या आरजू होगी
'मेरे हमसफ़र' जी भर के जिया करो, तुम हरदम खुश रहा करो ...
Thursday, October 9, 2008
डूबते इलाको की तकलीफ
बिहार और उडीसा में प्रदेश के डूबते इलाको की तकलीफ दब सी गई है। उत्तर प्रदेश के जीले बाराबंकी, लखीमपुर, गोंडा, बहराइच, बस्ती, सीतापुर, लखनऊ में बाढ़ उफान रही है। यहाँ भी इत्तेफाकन वैसी ही तस्वीर देखने को मीली, जैसी कुछ दीनों पहले बीहार में देखी थी।
गले-गले डूबे, झोपडी के ऊपर आसरा लिए,हाथ जोड़े मदद की गुहार लगाते, पेड़ पर टिके, जान बचाने को भागते,नाव पर लदे लोग..... । कई गाव तो नक्से से ही गायब हो गए।खाने के लिए दाना नही है। भूख से अकुलाए बच्चो के लिए माँ के पास सिर्फ दिलासा है। जो राहत मील रही है, वह पीडितो की नजर में महज खानापूर्ती है । सरकार की सक्रियता के बावजूद लोग मदद के लिए परेशान है। सवाल है आख़िर राहत जा कहाँ रही है ?
गले-गले डूबे, झोपडी के ऊपर आसरा लिए,हाथ जोड़े मदद की गुहार लगाते, पेड़ पर टिके, जान बचाने को भागते,नाव पर लदे लोग..... । कई गाव तो नक्से से ही गायब हो गए।खाने के लिए दाना नही है। भूख से अकुलाए बच्चो के लिए माँ के पास सिर्फ दिलासा है। जो राहत मील रही है, वह पीडितो की नजर में महज खानापूर्ती है । सरकार की सक्रियता के बावजूद लोग मदद के लिए परेशान है। सवाल है आख़िर राहत जा कहाँ रही है ?
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